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मक्का बोने का सबसे बढ़िया समय 15 जून से 15 जुलाई के बीच होता है खासकर जब पहली बारिश हो जाए।
अगर आपके पास प्लांटर मशीन, GPS ट्रैक्टर या नो-टिल सीडर है, तो काम और भी आसान हो जाएगा।
खरपतवार पर शुरुआत से काबू पाना ज़रूरी है,एट्राज़िन या टेम्बोट्रियोन जैसे हर्बिसाइड्स का सही समय पर छिड़काव करें।
फॉल आर्मीवर्म जैसी कीटों से बचाव के लिए समय पर दवा का छिड़काव करें नही तो लापरवाही भारी पड़ सकती है।
और हां, उत्तर प्रदेश सरकार ₹15,000/क्विंटल तक बीज सब्सिडी भी देती है, इसका फायदा जरूर उठाएं।
जैसे ही मानसून की शुरुआत होती है, मक्का की बुवाई का सही समय भी आ जाता है अगर बीज अच्छा हो, मिट्टी तैयार हो, मशीन सही हो और तकनीक समझदारी से अपनाएं, तो मक्का की फसल सोने जैसी चमकती है।
बुवाई का सबसे बढ़िया टाइम 15 जून से 15 जुलाई तक ICAR भी यही कहता है कि अगर 50 मिमी से ज़्यादा बारिश हो गई हो, तो उसी के बाद बुवाई करनी चाहिए। जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और बीज अच्छे से अंकुरित होते हैं।
आज के ज़माने में खेती मशीनों के बिना अधूरी है। अगर सही औजार हो, तो ना मेहनत ज़्यादा लगती है और ना ही पैदावार में कमी आती है:
GPS वाले ट्रैक्टर- खेत को सीधी लाइन में जोतने और सटीक बीजारोपण के लिए बढ़िया विकल्प है
प्लांटर मशीन- बीज को एकसमान गहराई में डालती है, जिससे फसल एक जैसी बढ़ती है
नो-टिल सीड ड्रिल- पुराने अवशेषों में बिना हल चलाए बीज बोने में काम आती है
कंबाइन हार्वेस्टर- कटाई का झंझट खत्म साथ ही समय और मेहनत दोनों की बचत
इनसे खेत की मिट्टी की ताकत बनी रहती है और मक्का की बालियाँ भी जोरदार आती हैं।
इथेनॉल, मुर्गी चारा और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में मक्के की ज़बरदस्त डिमांड है
UP सरकार "त्वरित मक्का विकास कार्यक्रम" में ₹15,000/क्विंटल तक बीज सब्सिडी दे रही है
हाइब्रिड, पॉपकॉर्न, स्वीट कॉर्न, बेबी कॉर्न – सब बीज सस्ते में मिलते हैं
टूरिज़्म और शहरों में स्वीट कॉर्न–पॉपकॉर्न की माँग तेजी से बढ़ रही है और दाम भी अच्छे मिलते हैं
आजकल खेतों में बिना हल चलाए ही मक्का बोने का चलन बढ़ रहा है। इसे नो-टिल खेती कहते हैं। इसमें मिट्टी की जुताई नहीं होती, बल्कि सीधे बीज डाल दिए जाते हैं, इसका बड़ा फायदा ये है:
मिट्टी की नमी और संरचना बनी रहती है
खेत में कार्बन जमा रहता है, जिससे ज़मीन की ताकत बढ़ती है
मिट्टी बहने (अपरदन) की दिक्कत कम होती है
इसके लिए किसान भाई नो-टिल सीड ड्रिल या डिस्क सीडर मशीन का इस्तेमाल कर सकते हैं। हां, शुरुआत में थोड़ा सही मैनेजमेंट और मशीन चाहिए, लेकिन जब तरीका जम जाए तो पैदावार में सुधार दिखने लगता है, और मिट्टी भी साल-दर-साल उर्वर बनी रहती है।
ICAR की सलाह के अनुसार, किस्म के अनुसार बीज की दर कुछ इस तरह है:
मक्के का प्रकार | बीज दर (किग्रा/हेक्टेयर) |
हाइब्रिड मक्का | 17.5 - 20 किग्रा |
स्वीट कॉर्न | 7.5 - 10 किग्रा |
पॉपकॉर्न | 12.5 किग्रा |
बेबी कॉर्न | 25 किग्रा |
सही मात्रा में बीज डालने से ना सिर्फ अंकुरण अच्छा होता है, बल्कि पौधे भी मजबूत होते हैं।
बुवाई के 2-3 दिन के भीतर एट्राज़िन डालना खरपतवार रोकने में बहुत कारगर होता है:
हल्की मिट्टी में: 2 किग्रा/हेक्टेयर
भारी मिट्टी में: 3 किग्रा/हेक्टेयर
इसे 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें
यह करीब 30 दिन तक खरपतवार को रोकने में मदद करता है।
नो-टिल या जीरो टिल खेती में 15 से 18 दिन (चार पत्तियों वाली अवस्था) के आसपास नीचे दिए गए स्प्रे करें:
टेंबोट्रिओन 34.4% SC @ 287.5 मिली + एट्राज़िन 50% WP @ 1 किलो/हेक्टेयर
टोप्रामेज़ोन 33.6% SC @ 75 मिली + एट्राज़िन 1 किलो/हेक्टेयर
अगर खेत में साइपरस घास है, तो हेलोसल्फ्यूरॉन मिथाइल 100 ग्राम/हेक्टेयर को 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़कें।
मक्के की अच्छी सिंचाई के लिए सेंटर-पिवट सिंचाई प्रणाली बहुत उपयोगी है।
एक बड़ा पाइप पहियों पर घूमता है
पाइप में लगे स्प्रिंकलर हर हिस्से को बराबर पानी देते हैं
पानी के साथ-साथ खाद और पोषक तत्व भी डाले जा सकते हैं
इससे पौधे हर स्टेज पर सही मात्रा में पानी और पोषण पाते हैं।
फॉल आर्मीवर्म (FAW) एक बहुत ही खतरनाक कीड़ा है, खासकर मक्के की फसल के लिए। इसे रोकने के लिए हमें कुछ चीजें करनी चाहिए:
गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें
पौधों पर अंडे दिखें तो तुरंत निकालकर नष्ट करें
फेरोमोन ट्रैप (4 जाल/एकड़) लगाएं
लोबिया जैसी फसल के साथ इंटरक्रॉपिंग करें
अज़ादिराच्टिन 10000 ppm @ 2 मि.ली./लीटर- 10–15 दिन के अंतराल पर
BT या EPN स्प्रे @ 2 मि.ली./लीटर- 15–21 दिन के अंदर
फॉल आर्मीवर्म को नियंत्रित करने और मक्का उत्पादन बढ़ाने के लिए इस प्रक्रिया का पालन करें:
बुआई के बाद दिन | कीटनाशक का नाम | खुराक |
21–28 दिन | इमामेक्टिन बेंजोएट 5SG या स्पिनोसैड 480SC | 0.4 ग्राम/लीटर या 0.5 मि.ली/लीटर |
30–35 दिन | मेटारिज़ियम अनिसोप्ली स्प्रे (1x10 CFU) | 2 मि.ली/लीटर |
36–42 दिन | फ्लुबेंडियामाइड 480SC / क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5SC / स्पिनेटोरम 11.7SC | 0.3 मि.ली/लीटर |
कभी भी (संक्रमण हो) | थियोडिकार्ब 75WP + चावल की भूसी + गुड़ | 250 ग्राम + 25 किग्रा + 5 किग्रा/हेक्टेयर |
ये उपाय न केवल फॉल आर्मीवर्म से बचाव करते हैं, बल्कि फसल की गुणवत्ता और उपज को भी बेहतर बनाते हैं,
खेत की स्थिति के अनुसार हल्का फेरबदल किया जा सकता है लेकिन ये बेसिक रूटीन सार्थक और कारगर है।
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अगर मक्का की खेती को सही तरीके से किया जाए, तो ये खरीफ में अच्छा मुनाफा देने वाली फसल बन सकती है। बुवाई का सही समय 15 जून से 15 जुलाई के बीच होता है, और अगर इस दौरान हम आधुनिक मशीनों जैसे प्लांटर या नो-टिल ड्रिल का इस्तेमाल करें, तो मेहनत भी कम लगती है और फसल अच्छी खड़ी होती है।
अब शून्य जुताई (नो-टिल) और जैविक तरीकों को अपनाने से न सिर्फ मिट्टी की सेहत बनी रहती है, बल्कि उत्पादन में भी फर्क साफ दिखता है साथ ही, समय पर कीट नियंत्रण और सिंचाई का ध्यान रखना भी जरूरी है, आजकल सरकार की तरफ से कई सब्सिडी स्कीम्स चल रही हैं, और मक्के की मांग भी इथेनॉल और फूड इंडस्ट्री में तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में अगर सही प्लानिंग और तकनीक से मक्का बोई जाए, तो किसानों के लिए यह फसल एक बढ़िया कमाई का जरिया बन सकती है।
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